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मंदिर

भारत के दक्षिण पूर्व में स्थित करोड़ों लोगों की श्रद्धा एवं आस्था के प्रतीक, वास्तुकला की मिसाल तथा हमारी संस्कृति की पहचान "श्री महामाया मंदिर, रतनपुर" आपका स्वागत करता है।

कई दशकों से इस मंदिर ने अनेक इतिहासकारों तथा पुरातत्त्वविदों को अपनी ओर आकर्षित किया है। चारों ओर से हरी हरी पहाड़ियों से घिरी, लगभग 150 तालों को अपनी गोद में समेटे रतनपुर नगरी में वर्ष में 2 बार भक्तों का तांता लगता है। भक्तगण लाखों की संख्या में नवरात्र के पर्व पर अपनी आराध्य देवी महामाया की प्रतिमा-द्वय के दर्शनों के लिए उमड़ पड़ते हैं। बिलासपुर-अंबिकापुर राजमार्ग (छत्तीसगढ़) में बिलासपुर से 25 किलोमीटर पर ऐतिहासिक रत्नपुर (अब रतनपुर) की नगरी में स्थित दर्जनों छोटे मंदिर, स्तूप, किले तथा अन्य निर्माणों के पुरावशेष मानों अपनी कहानी बताने के लिये तत्पर हैं।

रतनपुर का इतिहास लगभग एक सहस्त्राब्द से भी पुराना है।


महामाया मंदिर का मुख्य स्तूप

वास्तुकला के "नागर" घराने पर आधारित मंदिर के चारों ओर 18 इंच मोटा परकोटा है। सोलह प्रस्तर स्तंभों पर आधारित यह मंदिर बारहवीं सदी के लगभग निर्मित माना गया है। मंदिर में प्रयुक्त मूर्तियां तथा अन्य उत्कीर्ण अभिलेख पुरातन मंदिरों - जिनमें जैन मंदिर भी शामिल हैं - के भग्नावशेषों से लिए गये थे। मंदिर में एक मुख्य परकोटा तथा परकोटे के बाहर अन्य कई मंदिर हैं। परकोटे के अंदर मां महामाया के मंदिर के अलावा मां महाकाली, मां भद्रकाली, श्री सूर्यदेव, भगवान विष्णु एवं शिवजी की मूर्तियां हैं।

यह मान्यता है कि मां महामाया देवी का प्रथम अभिषेक एवं पूजा कलिंग के महाराज रत्न देव ने ईस्वी सन्‌ 1050 में इसी स्थान पर की थी, जब उन्होंने अपनी राजधानी तुमान को रत्नपुर स्थानांतरित किया था। रणनीतिक दॄष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण राजा रत्नदेव एवं उनके उत्तराधिकारियों ने रत्नपुर को राजधानी बनाकर यहां विभिन्न राजप्रासाद, किले तथा मंदिरों का निर्माण करवाया जिनके पुरावशेषों को आज भी देखा जा सकता है।

Dual statue of Maa Mahamaya
मां महामाया की प्रतिमा-द्वय

मंदिर के मुख्य परकोटे के अंदर, प्रसिद्ध कंठी देवल मंदिर तथा मुख्य ताल के सामने मां महामाया की अद्‌भुत प्रतिमा द्वय है: सामने की प्रतिमा मां महिषासुर मर्दिनी की तथा पीछे की मां सरस्वती की मानी जाती है। वैसे, सरसरी निगाह से देखने वाले को पीछे की प्रतिमा दिखाई नहीं देती। नवरात्र के समय न सिर्फ देश के कोने कोने से वरन देश के बाहर से लाखों की संख्या में श्रद्धालुगण मंदिर पहुंचकर मां के दर्शन कर तथा अर्चना कर अपने आपको धन्य समझते हैं।

मंदिर के चारों ओर कई बड़े हॉल हैं जिनमें ट्रस्ट के द्वारा श्रद्धालुओं की ओर से ज्योति कलश प्रज्जवलित लिये जाते हैं। ये ज्योति कलश अखंड ज्योति कलश कहलाते हैं क्योंकि इन्हें नवरात्र के सभी नौ दिन प्रज्जवलित ही रखा जाता है। इन्हें अखंड मनोकामना नवरात्र ज्योति कलश की संज्ञा भी दी जाती है, क्योंकि यह मान्यता है कि जो लोग उपवास, पूजा, अर्चना के साथ इन ज्योति कलशों की स्थापना करवाते हैं, मां उनकी मनोकामना पूर्ण करती हैं.

मुख्य परकोटे के चारों ओर ऐतिहासिक और पुरातात्त्विक दृष्टि से उतने ही महत्त्वपूर्ण अनेक अन्य मंदिर हैं। इनमें से मुख्य महामृत्युंजय पञ्चमुखी शिव मंदिर तथा कंठी देवल हैं। पञ्चमुखी शिव मंदिर लाल पत्थर से निर्मित वास्तुकला का एक बेहतरीन नमूना है और यह मान्यता है कि मां महामाया की प्रतिमा का उद्‌गम यहीं पर हुआ था। यह भी मान्यता है कि यथोचित पूजा अर्चना के बाद इस मंदिर के सामने वृक्ष पर लाल कपड़े में श्रीफल लपेटकर बांधने पर जो भी मनोकामना की जाती है वह शिवजी की कृपा से पूर्ण होती है।

कंठी देवल मंदिर का स्तूप आकार में अष्ट्कोणीय है तथा हिंदू और मुग़ल वास्तुकला का अनोखा संगम है। लाल पत्थर से बने इस मंदिर की दीवारों को नौवीं से बारहवीं सदी के विभिन्न उत्त्कीर्ण मूर्तियों तथा कलाकृतियों से सजाया गया है। इनमें मुख्य कलाकृतियां हैं: शाल भंजिका, बच्चे को स्तनपान कराती हुई महिला, लिंगोद्‌भव शिव तथा एक कल्चुरि राजा की प्रतिमा। कंठी देवल मंदिर के भीतर एक शिव लिंग है। हिंदू धर्म में शिव लिंग को अक्षुण्ण, अलौकिक ऊर्जा का स्रोत माना गया है। यह माना जाता है कि यथोचित पूजा अर्चना के बाद शिव लिंग पर दूध चढ़ाने पर मानसिक एवं शारीरिक बल एवं ऊर्जा प्राप्त होती है।

इस मंदिर के बारे में शायद कम ही लोगों को ज्ञात होगा कि इसका पुनर्निर्माण हाल ही में भारत सरकार के पुरातात्त्विक विभाग द्वारा कराया गया है। पुनर्निर्माण पांच वर्षों तक चला किंतु मंदिर के मूल स्वरूप को अक्षुण्ण ही रखा गया।

Kanthi Dewal
कंठी देवल

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